मनीष कुमार सिंह, सुधीर कुमार मिश्र, नीतू, रोहित कुमार सिंह, (सह-प्राध्यापक शोध छात्र’’’सब्जीविज्ञान विभाग), बाँदा यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी बाँदा, नेशनल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज बरहलगंज गोरखपुर, इंस्टिट्यूट ऑफ़ एग्रीकल्चर साइंस बनारस हिन्दू बिश्वविद्यालय
हल्दी (कुरकुमा लोंगा) (कुलः जिंजिबिरेसिंया) कोमसाला, रंगसामग्री, औषधी और उबटन के रूप मे प्रयोग किया जाता है। भारत विश्व में हल्दी का सबसे बड़ा उत्पादक एंव उपभोक्ता देश है। आन्ध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, गुजरात, मेघालय, महाराष्ट्र, आसाम आदि हल्दी उत्पादित करने वाले राज्य है। जिन में आन्ध्र प्रदेश प्रमुख राज्य है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के वाराणसी, फैजाबाद, इलाहाबाद, जौनपुर, मिर्जापुर, गाजीपुर, देवरिया, गोरखपुर, महाराजगंज, बस्ती, बाराबंकी एंव गोण्डा जन पदों में हल्दी की खेती बहुतायत से की जाती है।
जलवायु एवं भूमि :
हल्दी की सफल खेती के लिए गर्म एंव नम जलवायु सर्वोत्तम है। औसत 750 से 1200 मिली 0 वर्षा उपयुक्त होती है। बोवाई तथा जमाव के समय कम वर्षा व पौधों की वृद्धि एंव विकास के समय अधिक वर्षा का अनुकूल प्रभाव फसल पर पड़ता है।
फसल परिपक्वता अवधि में पूर्ण शुष्क वातावरण की आवश्यकता होती है। इसकी खेती बिभिन्न प्रकार की मिटटी जैसे रेतीली मटियार दोमट मिटटी में की जाती है जिसका पी.एच. मान 5-7.5 होना चाहिए ।
खेत की तैयारी :
हल्दी की फसल के लिए पहली जुताई मिटटी पलट हलसे करनें के उपरान्त दो-तीन जुताइयां कल्टीबेटर/देशी हल से करके पाटा लगाकर मिटटी भुरभुरी कर लेना चाहिए। जीवांश कार्वन कास्तर बनाये रखनें के लिए अन्ति मजुताई के समय 25-30 टन भलीभांतिसड़ी हुई गोवर की खाद/कम्पेास्ट प्रतिहेक्टेयर की दरसे खेत में मिला देना चाहिए जीवांश कार्वन युक्त एंव भुरभुरी मिटटी में गाठों की संख्या एंव आकार दोनों में वृद्धि होती है।
बीज उपचार :
हल्दी की बोआई के पूर्व कंद को फँफूदी नाशक इ़ंडोफिल एम-45 की 2.5 ग्राम अथवा कारबेन्डेजिम-1 ग्राम प्रतिलीटर की दर से पानी में घोल बनाकर उपचारित करना चाहिए घोल में कन्दों को 60 मिनट तक डुबोकर रखनें के उपरान्त छाया में सुखाकर 24 घण्टे पश्चात् की बोआई करना चाहिए।
बोआई का समय :
हल्दी की बोआई का उचित समय 15 अप्रैल से 30 जून तक होता हेै। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कम एवं मध्यम अवधि वाली किस्मों के लिए 15 मई से 15 जून और लम्बी अवधि वाली किस्मों के लिए 15 से 30 जून तक का समय सर्वोत्तम है।
बोआई की विधि :
हल्दी की बोआई क्यारियों में समतल भूमि पर अथवा मेड़ो पर या दोनो तरीकों से की जाती है।
समतल क्यारियों में पक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से.मी. तथा कन्द से कन्द की दूरी 20-25 से.मी. रखते है़ं। प्रत्येक कन्द को 4-5 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिए बोने के बाद सामान्य दशा में लगभग 30 दिन पर कन्द अंकुरित होती है। सिचिंत भूमि में अंकुरण 15-20 दिन में ही हो जाता है।
बीजदर :
प्रति इकाई क्षेत्र आवश्यक बीज की मातृ कन्दों के आकार पर निर्भर करता है। मुख्य रूप से स्वस्थ व रोग मुक्त मातृकन्द एवं प्राथमिक प्रकदों को ही बीज के रूप में प्रयोग करना चाहिए बोआई के समय प्रत्येक प्रकन्दों में 2-3 सुविकसित आंख अवश्य होनी चाहिए सामान्यता कन्द के आकार व वजन के अनुसार 15 से 20 कुन्तल कन्द प्रति हेक्टेअर की दर से आवश्कता होती है।
उन्नत प्रजातियों का चुनाव
| प्रजाति | फसल अवधि | ताजे कन्दो का औसत उत्पादन (टन/है.) | करक्यूमिन (प्रतिशत) | ओलियोरेजिन (प्रतिशत) | शुष्क उपलब्धता/पदार्थ (प्रतिशत) |
| नरेन्द्र हल्दी-1 | 200 | 32.7-35.0 | 5.6 | 11.5 | 22.0 |
| नरेन्द्र हल्दी-2 | 205-210 | 30.0-32.5 | 7.0 | 13.8 | 21.5 |
| नरेन्द्र हल्दी-3 | 200-220 | 30-33 | 6.1 | 12.7 | 21.0 |
| नरेन्द्र सरयू | 250-260 | 25-30 | 5-6 | 12-14 | 19-21 |
| नरेन्द्र हल्दी-98 | 230-240 | 35-37 | 4.3-5.2 | 11.09-12.97 | 19-21 |
| राजेन्द्र सोनिया | 225 | 27.0 | 8.4 | 10.0 | 18 |
| सुगन्धा | 210 | 15.0 | 3.10 | 11.0 | 23.3 |
| स्वर्णा | 200 | 17.5 | 8.70 | 13.5 | 20 |
| श्रोमा | 250 | 20.7 | 9.3 | 13.2 | 31.00 |
| सूरोमा | 255 | 20.0 | 9.3 | 13.1 | 26.0 |
| आई.आई.एस.आर. एल.पी. सुप्रीम | 34.5 | 35.4 | 6.0 | 16.0 | 19.0 |
| आई.आई.एस.आर. केदारम् | 34.5 | 34.4 | 5.5 | 13.6 | 18.9 |
हल्दी की कई उन्नतिशील प्रजातियाँ विकसित की गयी है। इनमें से कुछ अच्छी प्रजतियाँ दक्षिणी भारत में प्रचलित है। उत्तरी एंव पूर्वी भारत में राजेन्द्र सेानियां, नरेन्द्र हल्दी-2, नरेन्द्र हल्दी-3, बरूआ सागर पडरौना लोकल आदि किस्में अच्छी उपज देती है।
खाद एंव उवर्रक :
खाद एंव उवर्रक की मात्रा खेत की मिटटी जांच करवाकर दी जानी चाहिए। हल्दी की फसल अन्य फसलों की अपेक्षा भूमि से अधिक पोषकतत्वों केा ग्रहण करती है। अच्छी उपज में जीवाशकार्वन के महत्व को देखते हुऐ 250 से 300 कुन्तल प्रतिहैक्टेयर गोबर एवं कम्पोस्ट की सड़ी हुई खाद खेत की तैयारी के समय मिला देना चाहिए रासायनिक खा़द के रूप में प्रतिहैक्टेयर 120 से 150 किलोग्राम नत्र जन 80 किलोग्राम फासफोरस तथा 80 किलो पोटाश की आवश्यकता होती हैं नत्रजन की आधीमात्रा एंव फासफोरस व पोटाश की पूरीमात्रा पंक्ति के दोनो तरफ बीज (कन्द) से 5 से.मी. देर 10 से.मी. गहराई मेंडालना चाहिए नत्रजन की शेषआधी मात्रा दोबार खड़ी फसल में प्रथम बारबोआई से 35-45 दिन एवं द्वितीय बार 75 से 90 दिन परपंक्ति के बीचबुरकाव के रूप मेंडालना चाहिए। नाइट्रोजन उर्वरक के बुरकाव के समय ध्यान रखें की खेत में पर्याप्त नमी हो ।
सिचाईं एंव जलनिकास :
हल्दी की फसल को पर्याप्त सिंचाई की आवश्यकता होती है। मिट्टी किस्म, जलवायु, भूमि की संरचना, वर्षा एंव पलवार के अनुसार 10 से 20 दिनं के अन्तरालपर सिंचाई की जाती है। प्रकन्दों के जमाव व वृद्धि विकास के समय भूमि को नम रखना आवश्यक है।
उचित जल निकास के फसल के आवश्यक है इसके लिए खेत के ढाल की दिशा में 50 से.मी. चौडें तथा 60 से.मी. गहरी खाईबना देना चाहिए जिससे आवछिंत जल खेत से बाहर निकल जाये। वर्षा के समय खेत से जल निकास अत्यन्त आवश्यक है।
खरपतवार नियन्त्रण :
हल्दी के खेत में पत्तियों की पलवार (मल्चिगं) लगानें से काफी हद तक खरपतवार का नियन्त्रण हो जाता है। हल्दी की फसल में 2-3 बारगुड़ाई करनें से खरपतवार नियन्त्रण के साथ-साथ कन्दो में वृद्धि व विकास हेतु सुविधाजनक परिस्थितियां उपलब्ध होती है।
हल्दी में मुख्य रोग एंव नियंत्रण
| पर्णचिती | लक्षण | रोग प्रबंन्धन |
| (लीफ ब्लाच) मृदा एवं कंद जनित रोग | श्रोगग्रसित पत्तियों परल लाई युक्तभूरे धब्बे बनते है, जो प्रारम्भिक अवस्था में हल्के पीले फिर सुन हरे और बाद मेंगदेलापीला रंग सेललाई युक्तभूरे धब्बे में बदल जाते है। रोगग्रसित पौधा मरता नहीं है परन्तु पत्तियों की कार्य क्षमता में कमी होने से उपज कम हो जाती है। | 1.रोग ग्रसित फसल पर लक्षण दिखाने के उपरान्त डायथेन एम-45 (0.25 प्रतिशत) डायथेन जेड-75 (0.2 से 0.3 प्रतिशत घोल) ब्लइटाक्स-50 (0.3 प्रतिशत), घोलका 15 दिन के अन्तरालपर छिडकाव। |
| पूर्ण धब्बे (60 प्रति शततक उपजमें क्षति) कन्द जनितवायु द्वारा प्रसारित | रोगग्रसित पौधों की पत्तियों पर 4 से 5 से.मी.लम्बेगोल धब्बे धीरे-धीरे बडे होकर पूरी पत्ती को घेर लेते है। धब्बे के मध्य का भाग हल्कास लेटी और किनारा भूरा होता है। रोग की उग्रअवस्था में पत्ती सूखकर जली हुई प्रतीत होती है। पत्तियांका गज जैसी कड़ी और आवाज करती है। | 2.बीजोपचार –मेन्कोजेब (0.25 प्रतिशत) से 60 मिनट के बीजोपचार के बाद छांव में सुखाकर बोआई करें। 3 रोग प्रतिरोधी प्रजातियां चायना, ज्वाली, सोनिया व कृष्णा 4 रोग ग्रसित पौधे के अवशेष जलाकर नष्ट कर दें। 5 स्वास्थ्य रोगरहित बीज बोएं। |
हल्दी में मुख्य कीट एंव नियन्त्रण
| कीट | लक्षण | नियन्त्रण |
| बालदारसूड़ी हेयरकैटरपीलर | बहुभक्षीय कीट है जोकि प्रारम्भिक अवस्था में समूह के रूप में पत्तियों को खाकर नुकसान पहुचाता है। पूर्ण विकिसित सूडी पत्तियों को खाकर जालीनुमा आकृति शेषछोड़ देतीहै। | 1.प्रारम्भिक अवस्था में समूह में सूड़ी के साथ पत्तियां तोड़ कर दूरस्थान पर जमीन में दबाकर नष्ट कर दें अथवा जलादें। 2.ऐन्डोसल्फान 35 ई. सी. की 1.5 लीटरमात्रा प्रतिहेक्टयर या मैलाथियान 50 ईसी की 2 लीटर मात्रा का 500 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। 15-20 दिनबाद एक बार पुनः छिड़काव करें। |
खुदाई एंव भण्डारण :
हल्दी की खुदाई, बोआई के 6 से 9 महीने बाद जब पोधें की पत्तिया पीली पड़कर सूखनें लगें तब फसल खुदाई हेतु तैयार समझना चाहिए। कंदों की खुदाई के समय भूमि में हल्की नमी का होना लाभप्रद रहता हैं इससे पूरे कंदों को अच्छी तरह से निकाला जा सकता है। कन्दो से ऊपर की पत्तियों को काटकर अलग कर लेते है। इनमें से बीजों के लिए कंदों की छपाई करके भण्डारण कर लेते है। कंदों को पानी से अच्छी तरह साफ करनें के बाद प्राथमिक व द्वितीयक कदों को अलग-अलग कर लेते है। और विधिपूर्वक उबालनें के उपरान्त सुखाकर हल्दी के रूप बेच देना चाहिए ।
उपज :
उन्नतशील प्रजातियों की औसत उपज (ताजा प्रकद) 250-300 कुन्तल प्रति हैक्टयेर होती है।
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